इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया
बड़ी खबर देश से बिहार के दरभंगा राजघराने की महारानी कामसुंदरी का निधन इसी दुखद सच्चाई का प्रमाण है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान

इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, और बिहार के दरभंगा राजघराने की महारानी कामसुंदरी का निधन इसी दुखद सच्चाई का प्रमाण है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश गंभीर आर्थिक और सैन्य संकट से गुजर रहा था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अपील पर दरभंगा राजघराने ने राष्ट्रीय रक्षा कोष में 600 किलो (यानी 15 मन) से अधिक शुद्ध सोना दान कर दिया था। यह किसी भी निजी परिवार द्वारा देश को दिया गया अब तक का सबसे बड़ा दान था। उसी राजघराने की 94 वर्षीय महारानी कामसुंदरी का हाल ही में निधन हो गया, लेकिन इस महान देशभक्त महिला के अंतिम संस्कार में न तो कोई बड़ा राजनेता पहुँचा और न ही राष्ट्रीय मीडिया ने इसे तवज्जो दी।
आइए उनकी इस महान विरासत के कुछ प्रमुख बिंदुओं पर एक नज़र डालें:अभूतपूर्व दान: 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, जब देश गंभीर आर्थिक संकट में था, तब महारानी के परिवार ने राष्ट्रीय रक्षा कोष में लगभग 600 किलो शुद्ध सोना दान किया था। यह किसी भी निजी परिवार द्वारा देश को दिया गया सबसे बड़ा दान माना जाता है।अन्य महत्वपूर्ण योगदान: सोने के अलावा, राजघराने ने तीन निजी विमान और 90 एकड़ हवाई पट्टी भी देश को सौंपी थी, जिसे आज दरभंगा एयरपोर्ट के रूप में जाना जाता है।सांस्कृतिक और शैक्षणिक विरासत: दरभंगा राजघराने ने केवल युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) और पटना यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाओं की स्थापना और वित्तपोषण में भी बड़ा योगदान दिया था।एक सादा जीवन: राजसी ठाठ-बाट होने के बावजूद, महारानी कामसुंदरी देवी ने हमेशा बेहद सादा जीवन जिया। वे हमेशा सामाजिक कल्याण और शिक्षा को बढ़ावा देने में सक्रिय रहीं।महारानी कामसुंदरी का निधन यकीनन एक युग का अंत है, और उनके अंतिम संस्कार के दौरान राष्ट्रीय मीडिया व राजनीतिक उदासीनता ने लोगों को इस बात का अहसास कराया कि कैसे इतिहास के असली नायकों को मुख्यधारा में वो सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं।



